Thursday, November 24, 2011

for my papa

बीते हुए दिनों की वो,महक कभी आ जाती है.
एक धुंदली सी तस्वीर , आँखों पे छा जाती है.
वो छोटी छोटी डांट, और उसके बाद दुलार.
वो मेरे अनसुलझे सवालों पे, लुटाना मुझपे प्यार.
उस एक हर लम्हे की, याद बरबस आ जाती है.
बीते हुए दिनों की वो, महक कभी आ जाती है.
ये मीठी यादें अब तो, झूठे सपने जैसी लगती हैं.
जब उस भयानक रात की, लपटे आने लगती हैं.
अब  तो हार चढ़ी तस्वीरों मे ही,आपसे मिलना होता है.
मेरे सवालो के जवाब न मिलने पे, दिल जोरो से रोता है.
वो जुडती हुई कड़ियाँ , फिर से टूट जाती हैं.
बीते हुए दिनों को वो, महक कभी आ जाती है.
                                                         मेरे पापा श्री दीप कुमार भंडारी को समर्पित.

for my husband

अपनी प्यारी सी मुस्कान से,
मेरे होंठो पे हंसी लाने का शुक्रिया. 
जिस ज़िन्दगी की चाह थी मुझे,
उस ज़िन्दगी में मुझे शामिल करने का शुक्रिया.
वक़्त की मुश्किलों के साथ अकेली थी मैं  ,
आकर मेरा हाथ थामने का शुक्रिया.
हम लड़े, झगडे, तकरार हुई,
फिर भी उस बढ़ते प्यार का शुक्रिया.
ज़िन्दगी के इस सुनसान सफ़र मे,
आकर मेरे हमसफ़र बनने का शुक्रिया.
मैं बेटी, बहु और बीवी बनी,
अपना नाम दे कर मुझे पूरा करने का शुक्रिया.
हंसी-ख़ुशी, सुख-दुःख मे ये पूरा साल बीत गया,
शादी के इस पहले साल को एक खूबसूरत याद बनाने का शुक्रिया.
मेरे अपनों को अपना कहने का शुक्रिया.
                                                         भूमिका भंडारी अग्रवाल