Friday, March 7, 2014

aashayein

मेरे मन की आशायें जो ,
उठने से पहले दब जाती हैं।
मैं इतनी कमज़ोर नहीं हूँ ,
फिर क्यों सपने बन कर रह जाती हैं।

परिंदो की तरह उड़ना चाहती हूँ मैं ,
खुली हवा मैं जीना चाहती हूँ ,
तस्वीर बन कर नहीं मैं ,
ज़िंदा रहकर जीना चाहती हूँ।
फिर भी एक डोर है ,
जो मुझे पीछे खीच ले जाती है ,
मैं इतनी कमज़ोर नहीं हूँ,
फिर क्यों सपने बन कर रह जाती है।

मेरी आशाओं के घर में ,
सोने का कोई महल नहीं ,
उम्मीदों के घर की एक ,
कोशिश है ये पहल नहीं।
फिर क्यों समाज के बेड़िया मुझे ,
क़ैद कर ले जाती हैं।
मैं इतनी कमज़ोर नहीं हूँ ,
फिर क्यों सपने बन कर रह जाती हैं।
                                                          भूमिका भंडारी अग्रवाल

mai beti hu...

माँ के हाथ की रोटी याद है.
पापा के साथ की मस्ती याद है. 
वो ठंडी ठिठुरति रातों में, एक रज़ाई की गरमाई याद है। 
आज इन यादो की मुझसे जुदाई हो गयी,
लोग कहते हैं , मैं बेटी हुँ , मैं तो परायी हो गयी। 

बचपन में सुना था मैंने, लड़का लड़की एक समान। 
फिर किसी ने कहा लड़की ही बढाती है अभिमान। 
धीरे धीरे ये बातें भी अनजान हो गयी ,
लोग कहते हैं , मैं बेटी हु , मैं तो परायी हो गयी। 

माँ ने कहा था , इस घर से उस घर ही तो जाना है ,
ये तो बस रिश्तो का छोटा सा तानाबाना है। 
फिर क्यों सबके आसुओ के साथ मेरी बिदाई हो गयी। 
क्या लोग सही थे  ?? मैं बेटी हु , मैं तो परायी हो गयी। 

जब नए घर में मैं आयी तो ,
कुछ नए रिश्तो ने जन्म लिया। 
मैं बीवी बहु और माँ बनी ,
जीवन ने रुख मोड़ लिया। 
फिर भी एक वो रिश्ता , बरबस याद मुझे आता है ,
मेरे अनसुलझे सवालो का जवाब , माँ के आँचल में मिल जाता है। 
वो घर मेरा अस्तित्व था , ये घर मेरा भविष्य है। 
फिर क्यों समाज की इस रीत से मेरी रुसवायी हो गयी। 
क्यों लोग  कहते हैं , मैं बेटी हूँ , मैं तो परायी हो गयी। 

बेटियां  ही माँ की सहेली और पिता का मान हैं। 
मायके का सुख और ससुराल की शान हैं। 
रिश्तो को सहेज कर रखना ,हमें अच्छे से आता है ,
माँ-बेटी या बहु-बहन का सुख हम ही से भाता है। 
माना कि अपनों के बीच से मेरी जुदाई हो गयी। 
पर ये कभी ना कहना ,,
मैं बेटी हूँ , मैं तो परायी हो गयी। 
                                                                          
                                                                                        भूमिका भंडारी अग्रवाल 
                                                                                                 हल्दवानी। 

Thursday, November 24, 2011

for my papa

बीते हुए दिनों की वो,महक कभी आ जाती है.
एक धुंदली सी तस्वीर , आँखों पे छा जाती है.
वो छोटी छोटी डांट, और उसके बाद दुलार.
वो मेरे अनसुलझे सवालों पे, लुटाना मुझपे प्यार.
उस एक हर लम्हे की, याद बरबस आ जाती है.
बीते हुए दिनों की वो, महक कभी आ जाती है.
ये मीठी यादें अब तो, झूठे सपने जैसी लगती हैं.
जब उस भयानक रात की, लपटे आने लगती हैं.
अब  तो हार चढ़ी तस्वीरों मे ही,आपसे मिलना होता है.
मेरे सवालो के जवाब न मिलने पे, दिल जोरो से रोता है.
वो जुडती हुई कड़ियाँ , फिर से टूट जाती हैं.
बीते हुए दिनों को वो, महक कभी आ जाती है.
                                                         मेरे पापा श्री दीप कुमार भंडारी को समर्पित.

for my husband

अपनी प्यारी सी मुस्कान से,
मेरे होंठो पे हंसी लाने का शुक्रिया. 
जिस ज़िन्दगी की चाह थी मुझे,
उस ज़िन्दगी में मुझे शामिल करने का शुक्रिया.
वक़्त की मुश्किलों के साथ अकेली थी मैं  ,
आकर मेरा हाथ थामने का शुक्रिया.
हम लड़े, झगडे, तकरार हुई,
फिर भी उस बढ़ते प्यार का शुक्रिया.
ज़िन्दगी के इस सुनसान सफ़र मे,
आकर मेरे हमसफ़र बनने का शुक्रिया.
मैं बेटी, बहु और बीवी बनी,
अपना नाम दे कर मुझे पूरा करने का शुक्रिया.
हंसी-ख़ुशी, सुख-दुःख मे ये पूरा साल बीत गया,
शादी के इस पहले साल को एक खूबसूरत याद बनाने का शुक्रिया.
मेरे अपनों को अपना कहने का शुक्रिया.
                                                         भूमिका भंडारी अग्रवाल 

Sunday, June 19, 2011

कुछ ना कहते हुए भी ज़िन्दगी बहुत कुछ कह जाती है।
हर अरमान को पल भर मे पूरा कर जाती है।
हर सपने को एक लौ देती है,
पर सपने को पल भर मे तोड़ भी देती है।
दिशाए देकर भी दिशा हीन कर जाती है।
कुछ न कहते हुए भी ज़िन्दगी बहुत कुछ कह जाती है।
पल भर मे शरारत करती है,
पल भर मे शिकायत करती है।
इस रंगीन सी दुनिया मे सबको बाँध कर रखती है।
कभी अपनों को मिलाती है,
तो कभी मिला कर भी बेगाना कर जाती है।
कुछ ना कहते हुए भी ज़िन्दगी बहुत कुछ कह जाती है.
एक बे-वफ़ा की नजरो में
वफ़ा तलाश रहे थे हम।
थी ख्वाइश की उन्हें अपना बना कर रखे,
पर सिर्फ तमन्नाओ में जी रहे थे हम।
कुछ खबर थी, और कुछ थे बे-खबर,
पर सबकी बातो पर थी हमारी नज़र।
जान के भी अनजान बन रहे थे हम।
वो दूर से इशारा कर रहे थे,
और हम पास आने का बहाना कर रहे थे।
सूनेपन के एहसास को शायद भर रहे थे हम।
एक बेवफा की नजरो में वफ़ा तलाश रहे थे हम.
ज़िन्दगी तुम बिन अधूरी सी लगती है।
दूर जाना तुमसे, मजबूरी सी लगती है।
यादो मे ना जाने कब तुम आते हो,
और पूरे मन पर छा जाते हो।
है एहसास कही ये मेरे मन में,
कि हर ख्वाइश अब पूरी सी लगती है।
ज़िन्दगी तुम बिन अधूरी सी लगती है।
वो तुम्हारा मुस्कुराना, और मेरा लौट के आना।
वो तुम्हारी बातें, जो बना देती दीवाना।
यादो कि वो खुशबू अब भीनी सी लगती है।
ज़िन्दगी अब तुम बिन अधूरी सी लगती है.